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पर्यायवाची शब्द

पर्यायवाची शब्द किसी शब्द-विशेष के लिए प्रयुक्त समानार्थक शब्दों को पर्यायवाची शब्द कहते हैं। यद्यपि पर्यायवाची शब्द समानार्थी होते हैं किन्तु भाव में एक-दूसरे से किंचित भिन्न होते हैं। •अमृत- सुधा, सोम, पीयूष, अमिय। •असुर- राक्षस, दैत्य, दानव, निशाचर। •अग्नि- आग, अनल, पावक, वह्नि। •अश्व- घोड़ा, हय, तुरंग, बाजी। •आकाश- गगन, नभ, आसमान, व्योम, अंबर। •आँख- नेत्र, दृग, नयन, लोचन। •अहंकार- दंभ, गर्व, अभिमान, दर्प, मद, घमंड। •अमृत- सुधा, अमिय, पीयूष, सोम, मधु, अमी। •असुर- दैत्य, दानव, राक्षस, निशाचर, रजनीचर, दनुज, रात्रिचर। •अतिथि- मेहमान, अभ्यागत, आगन्तुक, पाहूना। •अनुपम- अपूर्व, अतुल, अनोखा, अदभुत, अनन्य। •अर्थ- धन्, द्रव्य, मुद्रा, दौलत, वित्त, पैसा। •अश्व- हय, तुरंग, बाजी, घोड़ा, घोटक। •अंधकार- तम, तिमिर, तमिस्र, अँधेरा। •आम- रसाल, आम्र, सौरभ, मादक, अमृतफल, सहुकार। •आग- अग्नि, अनल, हुतासन, पावक, दहन, ज्वलन, धूमकेतु, कृशानु, वहनि, शिखी, वह्नि। •आँख- लोचन, नयन, नेत्र, चक्षु, दृग, विलोचन, दृष्टि, अक्षि। •आकाश- नभ, गगन, अम्बर, व्योम, अनन्त, आसमान, अंतरि...

पत्र

पत्र लिखकर व्यक्ति अपने मन के विचार आसानी से प्रकट कर सकता है। पत्र लेखन अपनी बात पूरी तरह स्पष्ट करने का सबसे सरल और सस्ता तरीका है। पत्र कई तरह से लिखे जाते हैं। सबका तरीका अलग होता है। पत्रों में मुख्यत: तीन भाग होते हैं। इसको ध्यान में रखकर पत्र लिखे जाते हैं। पत्र आरंभ और समाप्त करने की तालिका पत्र लिखते समय निम्न बिंदुओं को ध्यान में रखना चाहिए। पत्र का प्रकार संबंध (किसको पत्र लिखा) आरंभ (संबोधन) समापन व्यक्तिगत माता पिता, बड़े भाई, बड़ी बहिन तथा आदरणीय संबधियों को माननीय, आदरणीय, पूजनीय, परम पूज्य, श्रद्धेय, परम आदरणीय आदि। आपका, आपका आज्ञाकारी, स्नेही कृपा पात्र, स्नेहाकांक्षी, स्नेहादीन, सेवक आदि मित्र अथवा सहपाठी प्रिय मित्र, मित्रवर, प्रिय बंधु, बंधुवर, प्रिय आदि। तुम्हारा, तुम्हारा अपना, अभिन्न मित्र, चिर स्नेही, चिर शुभाकांक्षी आदि। पत्नी अथवा पति प्रिय, प्रियतमे, चिर सहचरी, प्राणेश्वरी आदि। आपका/आपकी चिर संगनी/ तुम्हारा ही, तुम्हारी ही आदि। अपने से छोटों को प्रिय, परम प्रिय, प्रियवर आदि। तुम्हारा शुभचिंतक, शुभाकांक्षी, शुभेच्छु ...

क्रिया-विशेषण

क्रिया-विशेषण क्रिया-विशेषण- जो शब्द क्रिया की विशेषता प्रकट करते हैं वे क्रिया-विशेषण कहलाते हैं। जैसे- 1.सोहन सुंदर लिखता है। 2.गौरव यहाँ रहता है। 3.संगीता प्रतिदिन पढ़ती है। इन वाक्यों में ‘सुन्दर’, ‘यहाँ’ और ‘प्रतिदिन’ शब्द क्रिया की विशेषता बतला रहे हैं। अतः ये शब्द क्रिया-विशेषण हैं। अर्थानुसार क्रिया-विशेषण के निम्नलिखित चार भेद हैं- 1. कालवाचक क्रिया-विशेषण। 2. स्थानवाचक क्रिया-विशेषण। 3. परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण। 4. रीतिवाचक क्रिया-विशेषण। *******@******* 1.कालवाचक क्रिया-विशेषण- जिस क्रिया-विशेषण शब्द से कार्य के होने का समय ज्ञात हो वह कालवाचक क्रिया-विशेषण कहलाता है। इसमें बहुधा ये शब्द प्रयोग में आते हैं- यदा, कदा, जब, तब, हमेशा, तभी, तत्काल, निरंतर, शीघ्र, पूर्व, बाद, पीछे, घड़ी-घड़ी, अब, तत्पश्चात्, तदनंतर, कल, कई बार, अभी फिर कभी आदि। 2.स्थानवाचक क्रिया-विशेषण- जिस क्रिया-विशेषण शब्द द्वारा क्रिया के होने के स्थान का बोध हो वह स्थानवाचक क्रिया-विशेषण कहलाता है। इसमें बहुधा ये शब्द प्रयोग में आते हैं- भीतर, बाहर, अंदर, यहाँ, वहाँ, किधर, उधर, इधर, कहाँ,...

वाच्य

वाच्य वाच्य-क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात हो कि वाक्य में क्रिया द्वारा संपादित विधान का विषय कर्ता है, कर्म है, अथवा भाव है, उसे वाच्य कहते हैं। वाच्य के तीन प्रकार हैं- 1. कर्तृवाच्य। 2. कर्मवाच्य। 3. भाववाच्य। *******@******* 1.कर्तृवाच्य- क्रिया के जिस रूप से वाक्य के उद्देश्य (क्रिया के कर्ता) का बोध हो, वह कर्तृवाच्य कहलाता है। इसमें लिंग एवं वचन प्रायः कर्ता के अनुसार होते हैं। जैसे- 1.बच्चा खेलता है। 2.घोड़ा भागता है। इन वाक्यों में ‘बच्चा’, ‘घोड़ा’ कर्ता हैं तथा वाक्यों में कर्ता की ही प्रधानता है। अतः ‘खेलता है’, ‘भागता है’ ये कर्तृवाच्य हैं। *******@******* 2.कर्मवाच्य- क्रिया के जिस रूप से वाक्य का उद्देश्य ‘कर्म’ प्रधान हो उसे कर्मवाच्य कहते हैं। जैसे- 1.भारत-पाक युद्ध में सहस्रों सैनिक मारे गए। 2.छात्रों द्वारा नाटक प्रस्तुत किया जा रहा है। 3.पुस्तक मेरे द्वारा पढ़ी गई। 4.बच्चों के द्वारा निबंध पढ़े गए। इन वाक्यों में क्रियाओं में ‘कर्म’ की प्रधानता दर्शाई गई है। उनकी रूप-रचना भी कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार हुई है। क्रिया के ऐसे...

काल

काल क्रिया के जिस रूप से कार्य संपन्न होने का समय (काल) ज्ञात हो वह काल कहलाता है। काल के निम्नलिखित तीन भेद हैं- 1. भूतकाल। 2. वर्तमानकाल। 3. भविष्यकाल। *******@******* 1. भूतकाल क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय (अतीत) में कार्य संपन्न होने का बोध हो वह भूतकाल कहलाता है। जैसे- (1) बच्चा गया। (2) बच्चा गया है। (3) बच्चा जा चुका था। ये सब भूतकाल की क्रियाएँ हैं, क्योंकि ‘गया’, ‘गया है’, ‘जा चुका था’, क्रियाएँ भूतकाल का बोध कराती है। भूतकाल के निम्नलिखित छह भेद हैं- 1. सामान्य भूत। 2. आसन्न भूत। 3. अपूर्ण भूत। 4. पूर्ण भूत। 5. संदिग्ध भूत। 6. हेतुहेतुमद भूत। 1.सामान्य भूत- क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय में कार्य के होने का बोध हो किन्तु ठीक समय का ज्ञान न हो, वहाँ सामान्य भूत होता है। जैसे- (1) बच्चा गया। (2) श्याम ने पत्र लिखा। (3) कमल आया। 2.आसन्न भूत- क्रिया के जिस रूप से अभी-अभी निकट भूतकाल में क्रिया का होना प्रकट हो, वहाँ आसन्न भूत होता है। जैसे- (1) बच्चा आया है। (2) श्यान ने पत्र लिखा है। (3) कमल गया है। 3.अपूर्ण भूत- क्...

क्रिया

क्रिया की परिभाषा- क्रिया- जिस शब्द अथवा शब्द-समूह के द्वारा किसी कार्य के होने अथवा करने का बोध हो उसे क्रिया कहते हैं। जैसे- (1) गीता नाच रही है। (2) बच्चा दूध पी रहा है। (3) राकेश कॉलेज जा रहा है। (4) गौरव बुद्धिमान है। (5) शिवाजी बहुत वीर थे। इनमें ‘नाच रही है’, ‘पी रहा है’, ‘जा रहा है’ शब्द कार्य-व्यापार का बोध करा रहे हैं। जबकि ‘है’, ‘थे’ शब्द होने का। इन सभी से किसी कार्य के करने अथवा होने का बोध हो रहा है। अतः ये क्रियाएँ हैं। धातु क्रिया का मूल रूप धातु कहलाता है। जैसे-लिख, पढ़, जा, खा, गा, रो, पा आदि। इन्हीं धातुओं से लिखता, पढ़ता, आदि क्रियाएँ बनती हैं। क्रिया के भेद- क्रिया के दो भेद हैं- (1) अकर्मक क्रिया। (2) सकर्मक क्रिया। *******@******* 1. अकर्मक क्रिया जिन क्रियाओं का फल सीधा कर्ता पर ही पड़े वे अकर्मक क्रिया कहलाती हैं। ऐसी अकर्मक क्रियाओं को कर्म की आवश्यकता नहीं होती। अकर्मक क्रियाओं के अन्य उदाहरण हैं- (1) गौरव रोता है। (2) साँप रेंगता है। (3) रेलगाड़ी चलती है। कुछ अकर्मक क्रियाएँ- लजाना, होना, बढ़ना, सोना, खेलना, अकड़ना, डरन...